राष्ट्र के निर्माण की मूलभूत इकाई : भूमि, जनता और संस्कृति

कोई भी राष्ट्र अपने नेतृत्व कर्ता के मार्गदर्शन में चलता है। राष्ट्र के जनता की विचारधारा भी नेतृत्व करने वाले के अनुसार होती है।  प्रारंभ में राष्ट्र की मूलभूत इकाई भूमि, जनता और संस्कृति थी। समूचा राष्ट्र इन्हीं स्तंभों पर टिका था।

वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने लिखा “भूमि ,भूमि में बसने वाली जनता और उस जनता द्वारा बनाई गई संस्कृति इन तीनों के सम्मिश्रण से राष्ट्र का स्वरूप बनता है”। प्रारंभ में हम परंपराओं के अधीन थे। पूर्वजों के खींचे लकीर को अपनाकर अपना जीवन का निर्वाह करते थे। संक्षेप में कह सकते हैं हम आधुनिकता से हम दूर थे और उस ओर हमारा झुकाव भी नहीं था।

सती प्रथा, बाल विवाह, नरबली आदि परंपराएं मानव समाज के लिए अहितकारी थी। जो हमें पीछे कर रही थी। शायद इन परंपराओं को छोड़ना जरूरी था, पर इतना नहीं कि हम अपने मूलभूत इकाई को भूल जाए।

वर्तमान समाज तरक्की के आग में झुलस रहा है। प्रारंभ के राष्ट्र के स्तंभों को भूल चुका है। वह एक आधुनिक नेतृत्व में चल रहा है। गीता के वचन जो प्रत्येक मानव समाज को आत्मनिर्भर और कर्म करते रहने की प्रेरणा देते रहते थे, उनकी महत्ता ख़त्म ही है। इन पुराणों वेदों आदि को भूलकर उद्योगों तकनीकी प्रगति की ओर अग्रसर हैं।

शायद यह आवश्यक है और आवश्यक ही नहीं नितांत आवश्यक है, किंतु अपनी संस्कृति का निर्वाह करना, उसका प्रचार करना उससे भी आवश्यक है।  महात्मा गांधी ने महिलाओं के अधिकार के लिए कठोर परिश्रम किए। यह आंदोलन उस समाज के लिए आधुनिक था किंतु ऐसा तो पूरे भारतवर्ष में नहीं था। तो निश्चित रुप से महिलाओं के अधिकार की प्रेरणा उन्हीं पश्चिम के देशों से मिली। तो गांधीजी का पश्चिम के देशों का नकल करना बिल्कुल उचित था ।

इसी प्रकार हम अपने राष्ट्र के विकास के लिए अग्रणी देशों का नकल कर सकते हैं, इसके लिए जरूरी नहीं कि हम हर उन चीजों का नकल करें जो वहां पर प्रचलित हो । हमें अपने राष्ट्र के मूलभूत इकाई को समझना चाहिए और गर्व करते हुए अपने ही परंपरा और संस्कृति को अपनाकर औद्योगिकरण तकनीकी को साथ लेकर प्रगति की ओर निरंतर बढ़ते रहना चाहिए। अपने तरक्की के रास्ते में संस्कृति को भी तवज्जों देने की आवश्यकता है।

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