वंशवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद और जितने भी नाम दिए जाएं, ये सब समस्या एक ही हैं। बस फर्क इतना है कि नाम और रूप अलग अलग हैं।

ये समस्या समय के साथ ख़त्म नहीं होती बल्कि रूप बदल कर हमारे समाज में व्याप्त है। शुरुआत कब हुई कहना मुश्किल है पर यह जरूर कहा जा सकता है कि समाजिक संरचना के समय से यह फल फूल रहा है।

यह दीमक की भांति किसी भी संस्था को ख़त्म कर सकती है। मानव जाति लालच, वासना, लोभ के चलते खुद को प्राथमिकता देता आता है। उसे डर है कि उसकी विरासत गायब हो जाएगी, उसे आगे ले के जाने वाला कोई नहीं है। और इसी तरह राजवंशों का जन्म होता है।

विविध सांस्कृतिक मूल्यों के समूह को डर होता है अपने किसी भी विचारों के धरोहर के मिट जाने का, जो उन्हें एक समूह बनाने के लिए प्रेरित करता है। और यह समाज को अलग-अलग हिस्सों (सेक्शन) में विभाजित करता है। मानव जाति का स्वयं को सबसे महत्वपूर्ण और दूसरों की तुलना में सबसे अधिक महत्ता देना भी सामाजिक विभाजन का कारण है।

समाजिक संरचना को तय करने के लिए जाति व्यवस्था का गठन किया गया था, यह केवल कर्तव्यों पर आधारित वर्ग विभाजन का एक रूप था। यह पूरी प्रणाली उसी क्षण से एक खराब प्रणाली थी, जिस समय इसका गठन या व्युत्पन्न हुआ था।

यही प्रक्रिया आज एक व्यवस्थित भेदभाव बन कर हमारे समाज में विद्यमान है। जो इन दिनों स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लिंग, रंग, जाति, धर्म और कार्य वर्ग के आधार पर भेदभाव दुनिया भर में हैं।

अपनी विरासत को जीवित रखने की मानवीय प्रवृत्ति उन्हें अपने ही लोगों को अपने से चुनने के लिए मजबूर करती है, चाहे वह राजनीति हो या कोई भी कार्य स्थल। वे दूसरों की तुलना में अपने व्यक्तिगत लोगों का पक्ष लेते हैं।

एक पुरानी लोकोक्ति है कि “राजा का बेटा ही राजा बनेगा।” हमारे अपने लोगों के लिए कार्यस्थल पर एहसान करना कभी भी एक बुरी चीज नहीं थी, यह एक व्यक्ति की जरूरत और कर्तव्य है कि वह अपने लोगों को महत्ता दे।

समस्या तब शुरू होती है जब सत्ता में रहने वाले खुद के लोगों को प्राथमिकता देने या उनका समर्थन करने के लिए अन्य लोगों का शोषण करते हैं। इससे भारी नकारात्मकता का जन्म होता है, जो सामाजिक श्रृंखला के प्रवाह में उतार-चढ़ाव का कारण बनती है।

हर इंसान को अपनी ज़रूरतो को प्राथमिकता देने का अधिकार है, लेकिन वह सिर्फ केवल इसलिए नहीं कर क्योंकि यह शक्तिशाली वर्ग से संबंधित है।

इससे क्या होता है कि टैलेंट आमतौर पर दरकिनार हो जाता है और अयोग्य लोगों को काम मिलने लगता है, जिससे उस संगठन का विनाश होता है।

आमतौर पर इस व्यवस्था के कुछ अनुकूल परिणाम मिल जाए, या मिलते हैं, परन्तु यह इस बात का ना तो खंडन करता है ना जवाब देता है कि इस व्यवस्था के चलते जो नुकसान (जिन प्रतिभाओं का) हुआ उसकी जिम्मेदारी किसकी है।

बदलाव एक अकस्मात प्रकिया नहीं है, तब तो और जब वह सालों पुरानी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए हो। बदलाव एक सतत प्रक्रिया है, जिसकी शुरुआत एक छोटी इकाई से होती है। जो कि हम और आप हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here