कितना निष्कलंकित एवं सर्वोत्तम है, लोकतंत्र
कितना निष्कलंकित एवं सर्वोत्तम है, लोकतंत्र

लोकतंत्र, तानाशाही, धार्मिक सत्ता और राजतंत्र यह विभिन्न शासन प्रणालियां हैं जिनके अनुसार कोई भी मुल्क संचालित है। नियमों को बनाने और उन नियमों के परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए शासन व्यवस्था बनाई गई है। इन सभी व्यवस्थाओं में लोकतंत्र एक आदर्श व्यवस्था है। जहां शासन में जनता की पूर्ण भागीदारी होती है।

वहीं आज भी दुनिया में राजशाही से चलने वाले देशों की सूची काफी बड़ी है जिसमें ओमान, स्वाजीलैंड, दारूस्सलाम प्रमुख हैं, यहां राजशाही संवैधानिक है। यहां का लीडर या शासक एक विशेष परिवार से ही पीढ़ी दर पीढ़ी चुना जाता है। यह व्यवस्था एक तरह से बेहद पुरानी एवं बिल्कुल बेकार व्यवस्था है पर इस व्यवस्था में भी कुछ खासियत देखी जा सकती है।

यहां राजा जन्म से निर्धारित होता है इसलिए राजा को सत्ता पाने के लिए लूट ,मर्डर, जनता में आपसी नफरत फ़ैलाने की आवश्यकता नहीं होती। वही लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ता पाने के लिए न जाने क्या-क्या हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। राजतंत्र व्यवस्था में यह भी फायदा है कि अगर संयोग से राजा पराक्रमी ,सच्चरित्र , ईमानदार निकल गया तो प्रजा एवं मुल्कों को लाभ मिलता है, खैर यह लोकतंत्र में भी संभव है।

यहां धार्मिक सत्ता की भी बात की जानी चाहिए। मेरे दृष्टिकोण से यह सबसे खराब व्यवस्था है। यह मुल्क को कबीला बनाने की व्यवस्था है। सऊदी अरब, विकटन, इसके उदाहरण हैं। बेहद खूबसूरत एवं खनिज संपदा के अपार भंडारण के बावजूद आम जनमानस बेहद गरीब और अविकसित है।

वहीं अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, भारत समेत दुनिया के 56 मुल्कों मे सबसे आदर्श प्रणाली लोकतंत्र अपनाई गई है। पर यह कहना की कोई भी व्यवस्था निष्कलंकित हो या सर्वोत्तम है, उसमें कोई कमी नहीं है थोड़ा आभासी है। ।

लोकतंत्र की समीक्षा की जाए तो इसे भी दोस युक्त समझा जाएगा। पहले तो आदर्श लोकतंत्र स्थापित करना आसान नहीं है, इसके लिए हमेशा जागरूकता के साथ लड़ाई लड़नी पड़ेगी। पर अगर हम आदर्श लोकतंत्र के करीब पहुंच भी जाएं तो समस्या समाप्त नहीं होती, लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जनता के बहुमत को तवज्जो मिलता है।

अगर देश का बहुमत शराबी हो जाए, अश्लीलता देखने का लती हो जाए, गलत कार्य उसके जरूरत हो जाए, तो बहुमत की जनता के मांग के मुताबिक चुनाव का मेनिफेस्टो तैयार होगा। उदाहरण स्वरूप हम देख सकते हैं कि देश की अगर 70 फीसद नागरिक शराब के लिए मांग उठाने लगें तो देश की सत्ताधारी पार्टी सदन में बिल लाएगी और शराब कानूनी रूप से व्यक्ति का अधिकार हो जाएगा। यह जानते हुए भी कि शराब हानिकारक है हम इस उदाहरण के बेहद करीब हैं।

इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आरक्षण जैसे मुद्दे की समीक्षा भी संभव नहीं हो पा रही है कि कौन आरक्षण पाने के अधिकार से बाहर है और किसे अभी वास्तव में आरक्षण की जरूरत है, या अभी तक आरक्षण की क्या स्थिति है। हम इसकी चर्चा नहीं कर सकते क्योंकि बड़े बहुमत को बातों से भ्रमित कर नाराज किया जा सकता है।

वर्तमान परिदृश्य में लोकतंत्र का जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है तो कहा जा सकता है की लोकतंत्र में सही और गलत मायने नहीं रखता मायने रखता है कि देश की बड़ी संख्या का रुख क्या है।

पर इस व्यवस्था में सबसे बड़ी खासियत यह है कि तंत्र हम ही हैं । अगर जनता कर्मठ और इमानदार होगी तो व्यवस्था शानदार होगी। पूरी व्यवस्था जनता पर निर्भर करती है। जनता ईमानदार होगी तो व्यवस्था आदर्श होगी, जनता मक्कार होगी तो व्यवस्था बेकार होगी। तो व्यवस्था को ठीक करने के लिए स्वयं को ठीक करना सबसे बड़ा विकल्प है।

हम निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर वास्तविक समीक्षा के द्वारा संविधान में सही तरह के संशोधन कर सकते हैं। लोकतंत्र को और ज्यादा शाश्वत, सशक्त एवं आदर्श व्यवस्था बनाया जा सकता है, पर इसके लिए जरूरी है कि हमें लगातार खुली बहस, व्यापक जनचर्चा करनी पड़ेगी। अखबार, स्कूल, विश्वविद्यालय, कॉलेज, छात्र संघ, व्यापारिक संघ, बार एसोसिएशन, महिला मोर्चा एवं मजदूर तथा किसान संगठन सभी को मजबूत चर्चा की जरूरत है।

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