सामाजिक अपराधों पर सस्ती राजनीति आखिर कब तक

दुष्कर्म (और अनेकों सामाजिक अपराधों) के बढ़ते मामलों को लेकर अक्सर यह कहा जाता है कि दरअसल घटनाएं तो पहले भी होती थी, लेकिन अब उनकी रिपोर्टिंग ज्यादा हो रही है। इसमें सच्चाई हो सकती है, लेकिन इस सच का दूसरा पहलू यह भी तो है कि दुष्कर्म के मामलों में कमी नहीं आ रही है। विडंबना यह है कि इस ओर किसी का ध्यान नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है–

दुष्कर्म एक सामाजिक अपराध है लेकिन उस पर इतनी अधिक राजनीति होने लगी है कि लगता ही नहीं कि इस जुर्म की जड़े लोगों की सोच में निहित है और उनका निदान करने की आवश्यकता है। चूंकि महिलाओं के प्रति लोगों की सोच बदलने की कहीं कोई कोशिश नहीं हो रही है इसलिए हर किसी को यह लगने लगा है कि कानूनों को और कठोर बना दिया जाए तो हालात सुधर सकते हैं।

हाथरस कांड के बाद महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि वह दुष्कर्म के मामलों से निपटने के लिए उसी तरह का सख्त कानून बनाएगी जैसा आंध्र प्रदेश सरकार बनाने जा रही है। इसके पहले कई राज्य बच्चियों से दुष्कर्म के मामले में मौत की सजा का प्रावधान कर चुके हैं। इसके बाद भी हालात जस के तस हैं क्योंकि बच्चियों से दुष्कर्म के मामलों में निचली अदालतों की ओर से मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी ऊंची अदालतों द्वारा उनका निस्तारण करने की गति शिथिल है।

हाथरस कांड के दौरान ही दिव्यांगों के लिए काम करने वाले एक संगठन ने मांग की है कि दिव्यांग बच्चों से दुष्कर्म के मामलों में कानून और सख्त करने की जरूरत है। हो सकता है कि इसकी जरूरत हो, लेकिन आखिर कब तक यह माना जाता रहेगा कि कानूनों को कठोर करते जाने से दुष्कर्म जैसे संगीन अपराध को रोका जा सकता है।

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निःसंदेह कठोर कानूनों की एक अहम भूमिका है, लेकिन उन पर अमल भी तो होना चाहिए। इसके साथ ही किसी को यह भी तो सोचना चाहिए ऐसा क्या किया जाए जिससे सामाजिक अपराधों में कमी आए। निर्भया कांड के बाद यह बार-बार रेखांकित किया गया कि महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच बदलने के लिए कुछ करने की जरूरत है और इस जरूरत की पूर्ति घर परिवार और समाज को करनी होगी।

शायद बड़ों का कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन बच्चों को संस्कारित किया जा सकता है। यदि यह काम निर्भया कांड के बाद शुरू कर दिया गया होता तो बीते आठ सालों में महिलाओं के प्रति भावी पीढ़ी के नजरिये को परिष्कृत करने का एक रास्ता तय कर लिया गया होता, अगर इस रास्ते पर नहीं चला गया तो कानून कितने ही कठोर बना दिया जाए, अपेक्षित नतीजा हासिल होने के आसार कम ही हैं।

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