देश में प्रभावी नहीं है आनलाइन एजुकेशन।
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आज इस महामारी के दौर में आनलाइन एजुकेशन जरूरत बन गई है। हमें संक्रमण को फैलने से रोकना है। और उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जितना हो सके सोशल डिसटेंन्सिंग का पालन करें। आज जंहा पूरा विश्व कॉरोना के प्रोकोप से परेशान है। वैश्विक शक्तियां भी इस महामारी के सामने घुटने टेकते देखीं जा रही है। विज्ञान लगातर सोध में लगा हुआ है, जल्द इस महामारी का कोई स्थाई रूप से इलाज़ ढूढा जा सके। इंसान की जिंदगी पर इस महामारी का असर तो पड़ा ही है। चाहे वो सामाजिक रूप में हो, आर्थिक रूप में या फ़िर राजनीतिक। मस्तिस्क पर इस महामारी के समय का बहुत बड़ा दुष्परिणाम पड़ा है।

इस समय प्रचलन शुरू हो रहा है आनलाइन एजुकेशन का। कई विश्वविद्यालयों में आनलाइन एजुकेशन पद्धति से पठन पाठन की प्रक्रिया चल रही है। हर नई पद्धति को समय लगता है कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच पाए। इस बार दिक्कत यह है कि हमें अचानक इस पद्धति के तरफ़ मुड़ना पड़ा। जहां आज भी देश के बहुत से हिस्सों में आनलाइन सुविधाएं इतनी प्रचलन में नहीं हैं। अब अचानक से इस पद्धति का उपयोग में लाया जाना परेशानियां खड़ी करता है। आज भी बहुत से ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां बिजली कटौती बहुत है। बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके पास संसाधन नहीं है कि वह आनलाइन एजुकेशन पद्धति को अभ्यास में लाएं।

सरकार ने पहल की है टेलीविजन चैनलों के माध्यम से। जहां आज बहुत से चैनलों पर शिक्षा संबंधी जानकारियां प्रसारित कि जा रहीं हैं। लेकिन वह प्रभावी तभी हैं जब वह हर उस व्यक्ति तक पहुंच पाए जिन्हें इसकी आवश्यकता है। बिजली कटौती इतनी ज्यादा है कि इस माध्यम से शिक्षा भी धुंधली दिखाई देती लग रही है। वहीं आज बहुत से विश्वविद्यालयों में आनलाइन एक्जाम कराने की बात कही जा रही है। हर परिस्थिति को देखते हुए यह कहना ग़लत नही है कि ऐसा करना प्रभावी नहीं है।

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