पट्टचित्र : विलुप्ति के कगार पर खड़ी बिरासत की धरोहर
पट्टचित्र : विलुप्ति के कगार पर खड़ी बिरासत की धरोहर

हम एक प्राचीन कला के बारे में बात करेंगे जिसे “पट्टचित्र” के नाम से जाना जाता है। भारत को विभिन्न कलाओं, शास्त्रों और संस्कृतियों की धरोहर विरासत में मिली है। भारत के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग कलाओं से भरें हैं। पट्टचित्र, यह वास्तजामें पेंटिंग का एक पारंपरिक रूप है, जो ज्यादातर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में आज भी जीवित है, हालांकि दोनों जगह इसकी बनावट और बनने के तरीकों में काफी अंतर हैं। जिनमें से अधिकांश का पता लगाता है की ये पेंटिंग्स हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं, और कला रूप जगन्नाथ संस्कृति और वैष्णव संस्कृति से प्रेरित है।

पट्टचित्र नाम की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘पट्ट’ से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘कपड़ा’ और ‘चित्र’ का अर्थ है ‘चित्र’। पट्टचित्र इस प्रकार कपड़ों पर की गई एक पेंटिंग है। इसे जो खास बनाता है वो है पेंटिंग में इस्तेमाल किए जाने वाले रंग, जो सभी प्राकृतिक होते हैं और पेंटिंग शिल्पकार के हाथों से पूरी तरह से पारंपरिक तरीके से बनाई जाती है। मूल और प्रामाणिक पट्टचित्र सब्जियों या खनिजों से निकाले गए रंगों से बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, सफेद चाक पावर समुद्र शेल से पीसकर बनता है, कोयले से काला आदि। पुरानी सूती साड़ी और कागज को इमली के पानी और लकड़ी के गोंद के निलंबन में उभारे जाते हैं।

चित्रकार जो कि ओडिया रंगकर्मी हैं, ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल पारंपरिक पट्टचित्र बनाने के लिए करते हैं जो प्राचीन भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से एक उच्च महत्व रखता है। ओडिशा की पेंटिंग को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- पट्टचित्र या कपड़े पर पेंटिंग, दीवारों और दरवाजों पर पेंटिंग जिसे भित्ति चित्र कहते हैं और ताड़ के पत्तों पर जिसे पत्र चित्र या पोथी कहा जाता है।

इसकी उत्पत्ति 5 वीं शताब्दी में हुई, पुरी में साक्ष्य के अनुसार। पुरी, कोणार्क, भुवनेश्वर, सोनपुर आदि जगहों पर अभी भी इन कला रूपों का विशेषाधिकार है। गाँव रघुराजपुर पट्टचित्र के लिए दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध है क्योंकि अधिकांश परिवार पीढ़ियों से चित्रकार हैं। भगवान जगन्नाथ इस पेंटिंग का केंद्र है। वैष्णव, सायवा, शाक्य, रागचरित्र, बन्धुचित्रा आदि जैसी चित्रकला की संस्कृतियां भी हैं।

पट्टचित्र : विलुप्ति के कगार पर खड़ी बिरासत की धरोहर

वहीं बंगाल पट्टचित्र, पश्चिम बंगाल की चित्रकला को दर्शाता है। इसके विभिन्न रूप भी हैं जैसे दुर्गा पट, चालचित्र, त्रिहल पट्टचित्र, मेदिनीपुर पट्टचित्र और कालीघाट पट्टचित्र। यह धार्मिक कहानियों, लोक कथाओं आदि पर आधारित होता है। यहाँ आर्टिस्ट को पटुआ कहा जाता है। जिसका पटुआ संगीत के संबंध है। यह पूर्व-पीर काल में शुरू हुआ था, और बांकुड़ा, पुरुलिया, हावड़ा, मेदिनीपुर आदि कुछ क्षेत्रों में अभी भी जीवित है। पहली शताब्दी से 8 वीं शताब्दी तक इसकी उत्पत्ति की एक लंबी अवधि है। यहाँ पर जिन लोगों ने पट्टचित्र बनाया है, वे आमतौर पर कहानी से जुड़े गीत गाते हैं, पेंटिंग के साथ; हाथ से पट्टचित्र के पर अंकित घटनाओं की श्रृंखला को दिखाते हुए।

पट्टचित्र : विलुप्ति के कगार पर खड़ी बिरासत की धरोहर

आधुनिक युग में, लोग पश्चिमी संस्कृति और कला के को ज्यादा तवज्जो देने लगें हैं और अपने देश के प्राचीन समृद्ध कला में कम दिलचस्पी है। आज यह कला लुप्त होने के कगार पर है। एक मानक पट्टचित्र बनाने के लिए, इसमें लगभग 5 दिन से 15 दिन लगते हैं और कुछ को पूरा होने में एक महीना वहीं छोटे पट्ट्चित्र को कई घंटे लगते हैं। लेकिन कारीगरों को उनके श्रम के लिए कम भुगतान किया जाता है। इसके अलावा, एक कलाकार केवल अपने काम की पहचान का सपना देखता है जिसे शायद ही कोई बढ़ावा या तवज्जो देता है। इस कला से जुड़े अधिकांश लोग अब अगली पीढ़ी के लिए इसे पेशे के रूप में विरासत के तौर पर लेने में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। क्योंकि इसमे आगे कोई धन लाभ के जरिये नजर नहीं आते, उन्हें कोई वित्तीय फंड नहीं दिया जाता है।

हालाँकि हर आधुनिक समस्या के लिए एक आधुनिक समाधान की आवश्यकता है। कलाकारों को घर सजाने वाली समग्रियों को बानाना चाहिए, जो लोगों को फैंसी चीजे पसंद हैं वो, मास्क, ईयर रिंग्स, वॉल पेपर आदि इस कला पर बनी वस्तुओं को अवस्य जगह देंगे। सरकारी और गैर सरकारी संगठन दोनों उनके काम के प्रदर्शन के लिए प्रदर्शनी या कला दीर्घाओं की व्यवस्था करनी चाहिए। वे उनके लिए ऑनलाइन व्यवसाय की व्यवस्था कर सकते हैं। उन्हें वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए ताकि यह उन्हें यह विशेष काम करने के लिए प्रेरित करे। हमें भी सराहना करनी चाहिए कि वे प्राचीन कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह शायद विलुप्ति के छोर पर खड़ी यह धरोहर बचाई जा सकती है।

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