गुलज़ार साहब: जन्मदिन व्यक्तिगत रूप से मुझ पर उनके प्रभाव को याद करते हुए
Gulzar | IANS

लकड़ी की काठी“, “छिपकली के नाना हैं“, “चपा चपा चरखा चले” “चड्डी पहन के फूल खिला है” जैसे गाने में तो मेरे बचपन की आधी तस्वीर सिमटी हुई है। मुझे याद है मैं कैसे ज़िद कर के ये गाने को सुनता था। और अपनी आवाज़ में गुनगुनाते हुए पूरे घर में दौड़ लगाया करता था। एसे ही छोटी बड़ी मुस्कानों और यादों के साथ जुड़ा है गुलज़ार साहब से मेरा रिश्ता। आज जन्मदिन है गुलज़ार साहब का आइए एक याद के सफर पर मेरे साथ-

बचपन से ही मैं गाने सुनने का शौकीन रहा हूं। पहले मेरी दादी जी रेडियो सुना करतीं थीं, और मैं उनके साथ बैठ कर उनका साथ देता था। बालपन में इतनी समझ तो शायद ही थी कि गुलज़ार कौन हैं इसका इल्म हो। पर इतना जरूर याद है कि ये नाम मैं सुनता आया हूं अपने बचपन से, कभी दादी जी बात करने को मुझे वो सब कुछ बततीं थी जो शायद कोई बड़ा होता तो ग़ौरतलब सुनता। पर अक्सर होता मैं ही था उनका पार्टनर। बहुत दफा रेडियो पर भी गुलज़ार साहब का नाम सुनाई देता था, गानों, फिल्मों के विवरणिका के साथ।

बाल मन को वो अहमियत नहीं पता थी, पर जब थोड़ी समझ बढ़ी मैंने भी संगीत, सिनेमा और बाकी कलाओं में रूचि रखने लगा। यह मैं हमेशा कहता हूं कि मेरी दादी जी की देन है कि एक गाना किसने लिखा, किसका संगीत है, किसने आवाज दी है इन सब की ख़बर रखता हूं। तस्वीर बदली और हमारे घर टेलीविजन, डीवीडी प्लेयर, म्यूजिक प्लेयर आदि उपकरण आए और मुझे मिला मौका गुलज़ार साहब और तमाम और कलाकारों को जानने का।

गुलज़ार साहब एक प्रतिभा के धनी कवि, एक कुशल फिल्म निर्माता, एक कहानीकार और एक पिता हैं। वैसे गुलज़ार साहब को किसी परिचय की आवश्यकता तो नहीं है पर कुछ चीजें हैं जिन्हें मैं लिखना चाहता हूं। संवेदनाओं और भावनाओं के साथ बुनी गई कहानियों को लिखने के लिए जाने जाने वाले गुलज़ार साहब ने सबसे बहुत से यादगार गीत और फ़िल्में दी हैं।

गुलज़ार साहब: जन्मदिन व्यक्तिगत रूप से मुझ पर उनके प्रभाव को याद करते हुए
Gulzar Sahab at youger age

गुलज़ार साहब का जन्म 18 अगस्त, 1936 को दीना में हुआ था। जो की अब पाकिस्तान के अंतर्गत आता है। गुलज़ार साहब का नाम मूल रूप से सम्पूर्णान सिंह कालरा था। वह भारत विभाजन के बाद दिल्ली आ गए। कॉलेज के समय से ही संगीत के प्रति उनका झुकाव रहा है, वह अपने पड़ोसी के घर पर अभ्यास करते थे।

बिमल रॉय प्रोडक्शंस के तहत बनी फिल्म, “बंदिनी” के साथ बॉलीवुड में इन्होंने क़दम रखा। फिल्म की सफलता के बाद, बिमल दा ने उन्हें अपने पूर्णकालिक सहायक के रूप में काम पर रख लिया। गुलज़ार साहब की एक ख़ास बात यह भी रही है कि वह बाकी लोगों की तरह अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय सितारों के साथ काम करने से कभी नहीं हिचके।

गुलज़ार साहब की एक बात जो मुझे व्यक्तिगत रूप से काफ़ी पसंद है और इसका एक अलग ही प्रभाव है कि वह हमेशा अपनी फिल्मों में फ्लैशबैक का इस्तेमाल करते हैं। उनका मानना ​​है कि एक फिल्म (लेख) अतीत के प्रतिबिंब के बिना कभी भी पूरी नहीं होगी। मुझे याद है कि एक बार मैं गुलज़ार साहब द्वारा निर्देशित “अचानक” फ़िल्म का संवाद मैं अपनी मित्र को मौखिक रूप से पढ़ के सुना रहा था और उसमें वर्णित फ्लैशबैक के लिए मुझे बार बार रुक कर उसे बताना पड़ता था।

अपने संघर्ष के दिनों में, गुलज़ार साहब ने जीविकोपार्जन के लिए एक गेराज मैकेनिक के रूप में भी काम किया था। गुलज़ार साहब ने कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। उन्हें जिन फिल्मों के लिए सम्मानित किया गया उनमें से कुछ हैं, मौसम (निर्देशक), कोषिश (स्क्रीनप्ले) और माचिस (निर्देशन)। उन्होंने फिल्म, ‘इज्जत‘ के गीत (‘मेरा कुछ कुछ सामान… ’) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता है।

गुलज़ार साहब ने अभिनेत्री राखी से 15 मई, 1973 में शादी की। राखी जी और गुलज़ार साहब अपनी बेटी मेघना के जन्म के ठीक एक साल बाद अलग हो गए। गुलज़ार साहब एक अच्छे इंसान और पिता हैं।

एक नज़र डालते हैं गुलज़ार साहब के कृतियों पर-

एक लेखक के रूप में उनकी कुछ फिल्मों में दो दूनी चार (1968), खामोशी (1970), सफर (1970), आनंद (1971), गुड्डी (1971), बावर्ची (1972),और नमक हराम (1973) शामिल हैं।

गुलज़ार साहब ने अपने निर्देशन की शुरुआत मेरे अपने (1971) से की। इसके बाद वे परची (1972), मौसम (1975), अंगूर (1982) नामकेन (1982), आचानाक (1973), औरन्ही (1975), खुशबू (1975), किन्नरा (1977), इज्जत (1987), लेकिन … (1990) और माचिस (1996) जैसी क्लासिक फिल्में बनाईं।

उनकी टेलीविजन फिल्म मिर्जा गालिब (1988) को दर्शकों के द्वारा बड़े पैमाने पर काफी सराहा गया। गुलज़ार साहब ने अमजद खान और पंडित भीमसेन जोशी पर एक वृत्तचित्र के साथ-साथ मीरा कुमारी पर आधारित एक फ़िल्म का भी निर्देशन किया है।

उन्होंने मासूम (1983) और रुदाली (1993) जैसी फिल्मों के लिए पटकथा भी लिखी है, और दिल से (1998) और साथिया (2002) जैसी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं।

उनकी कविता की किताबों में है रात पश्मीने की; पुखराज; त्रिवेणी; चांद और मैं; मेरा कुछ सामान; खराशें; ख़ौफ; छैय्यां छैय्यां, कुच्छ और नज़्में। ‘एकता‘ नामक, बच्चों के लिए उनकी कहानियों की पुस्तक को राष्ट्रीय शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद से पुरस्कार भी मिला है।

वो बचपन की ‘लकड़ी की काठी‘ से बड़े होने पर ‘हमनें देखीं हैं उन आंखों की महकती खुशबू हाथ से छूके इस रिश्ते को इल्ज़ाम ना दो‘, ‘तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा‘ जैसे पंक्तियों के मतलब से मैंने दुनिया देखी है। भगवान् से गुलज़ार साहब के स्वस्थ्य और तंदुरुस्त रहने की दुआ करते हैं।


जन्मदिन मुबारक हो, गुलज़ार साहब!

Image source Bollywoodirect

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