नई शिक्षा नीति और इतिहास।

नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को विशेष तवज्जो दिया जा रहा है तो वही मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लाया जा रहा है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा भी बदलाव की ओर बढ़ रहा है। काबिलियत और रूचि के अनुसार विषय चयन करने की आजादी पर जोर दिया जा रहा है। और परीक्षा रट्टा मार कर याद रखने वाले सिद्धांत को हतोत्साहित करके परीक्षा को योग्यता एवं ज्ञान आधारित करने की कोशिश है।

पर नई शिक्षा नीति के जारी होते ही विरोध शुरू हो गया। तमाम बुद्धिजीवी, छात्र संगठन, शिक्षक एतराज जाहिर कर रहे हैं। वाम दलों का मानना है की नई शिक्षा पद्धति के द्वारा शिक्षा का व्यापार किया जाएगा। सरकार शिक्षा का निजीकरण कर रही है। ऐसे में शिक्षा आम आदमी से दूर हो जाएगी और आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ही अपने बच्चों को शिक्षित कर पाएगा जो बेहद दुखद एवं चिंताजनक है। वामपंथी एवं धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों की दूसरी आपत्ति है की इतिहास को बदला जाएगा। सरकार इतिहास के सही नायकों को दफन करके अपना भगवा एवं हिंदुत्व का एजेंडा लागू करेगी।

इतिहास अमर होता है, हार में भी एवं जीत में भी इतिहास समान होता है। अगर आंखों में आंसू है तथा होठों पर मुस्कुराहट है तो इतिहास का किरदार आशु का और मुस्कुराहट का वर्णन करना मात्र है। आशु को पोछना या हंसी को रोकने की कोशिश की जाएगी तो वह दर्शन हो जाएगा।

इतिहास किसी विचारधारा के प्रभाव में नहीं आता, बल्कि विचारधाराएं इतिहास से प्रभावित होती हैं। इतिहास कालचक्र का दर्शक मात्र है। इसलिए इतिहासकारों को भी निष्पक्ष रहना चाहिए। अगर सरकार वास्तव में इतिहास के साथ छेड़छाड़ करती है तो यह बेहद चिंताजनक है।

नई शिक्षा नीति और इतिहास।

निश्चित है अतीत के आधार पर वर्तमान की भविष्य बनती है। वामपंथी चाहते हैं कि लेनिन, कार्ल मार्क्स, भगत सिंह, अशफाक़ उल्ला खान सबसे ज्यादा प्रकाश में लायें जाए। वह मानते हैं कि बच्चे क्रांति का इतिहास पढ़ेंगे तो क्रांतिकारी पीढ़ियां तैयार होंगी।

वहीं दक्षिणपंथ का आरोप सदैव से रहा है कि हिंदुस्तान के इतिहास में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर घटनाओं और नायकों की उपेक्षा की गई है। वामपंथी इतिहासकारों ने भारत को सदा पराजित सिद्ध करने की कोशिश की है। इसलिए भारत के इतिहास को नए सिरे से जांचनें और प्रमाणिक करने की जरूरत है।

“उत्तर प्रदेश के बहराइच के राजा सुहेलदेव ने महमूद गजनी के खास सैयद सालार गाजी और उसकी फौज को हराया था पर उनके पराक्रम का उल्लेख नगण्य है। केरल के मार्तंड वर्मा बहुत से भाषाओं के विद्वान थे पर उनको कतई तवज्जो नहीं दिया गया।” यह आरोप इतिहासकारों का है।

बंकिमचंद्र ने लिखा था-“अरब एक तरह से दिग्विजय ही रहे हैं। उन्होंने जहां आक्रमण किया वहां जीते पर फ्रांस और भारत से पराजित होकर लौटे। उन्होंने मिस्र ,सीरिया, ईरान, अफ्रीका, स्पेन ,काबुल ,और तुर्किस्तान पर कब्जा किया पर 100 वर्ष में भी वे भारत को नहीं जीत सके। पर कुछ विद्वानों का मानना है कि यह नई पीढ़ी को अल्प ज्ञात है, उनका मानना है कि यह प्रकाश में आना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित का मानना है कि इतिहास में गर्व करने वाले प्रसंग होते हैं, गर्वोक्ति के प्रसंग राष्ट्रीय सामर्थ्य को बढ़ाते हैं ।उन्होंने इतिहास के हवाले से कहा – “राजेंद्र चोल ने दक्षिण पूर्व एशिया के बड़े भाग पर अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया। बंगाल की खाड़ी को चोल खाड़ी कहा जाने लगा था। उनके पास समुद्री सेना भी थी। भूले बिसरे नायकों की सूची में बंगाल के भास्कर वर्मन भी हैं। विजयनगर साम्राज्य अपनी शासन व्यवस्था के लिए चर्चा में रहा है। कृष्णदेव राय की शासन व्यवस्था आदर्श थी । उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति का विकास किया। आदर्श शासन के पीछे का सबसे बड़ा कारण था मुस्लिम समाज को बराबर का अधिकार और सम्मान देना। विजय नगर में भारतीय स्थापत्य की तीन शैलियां द्रविड़, नागर और वेसर का चरम विकास हुआ। पर इतिहास में राजा और राज्य की प्रतिष्ठा को भुला दिया गया”।

और आरोप यह भी है की “विजयनगर जैसी स्थिति महाराष्ट्र के बाजीराव और बालाजी बाजीराव के साथ भी है। उन्होंने दिल्ली के लाल किले पर हमला किया, जीता। माना जाता है कि हिंदू पद पादशाही उन्हीं की अवधारणा है। और ‘अटक से कटक’ तक भारत के विस्तार का भी जिक्र है।” हृदय नारायण दीक्षित ने आरोपित स्वर में लिखा है कि “यूरोपियम वामपंथी इतिहासकारों ने बाबर ,गजनी, गोरी ,औरंगजेब आदि को महत्व दिया। वह मध्यकाल को मुगल या मुस्लिम इतिहास सिद्ध करते रहे। मूर्तियां मंदिरों के ध्वंसकर्ताओं और उत्पीड़को को नायक के रूप में पेश किया गया”।

वहीं वामपंथी इतिहासकारों के अपने अलग तर्क हैं। उनका भी तर्क मजबूत एवं तटस्थ है। ऐसे में जरूरी है कि दलदल से बाहर आएं एवं स्वार्थवस आकर किसी प्रकार का मनमानी ना करें। इतिहास भूत नहीं अनुभूत होता है। इसमें शक्तिशाली स्मृति का गर्व भी हो और पराजय का दंश भी होना चाहिए जिससे गलती न दोहराने की सबक मिलती रहे। बेहतरीन राष्ट्र के निर्माण के लिए नई शिक्षा नीति में इतिहास का एहसास होना चाहिए इतिहास वास्तविक एवं तटस्थ होना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here