भारत और चीन के बीच बढ़ते तनाव के कारण एक बात जो हम सब सुन रहे हैं, वह है चीन के बने उत्पादों का बहिष्कार । ऐसा करने के क्या फायदे हैं इसपर कई तर्क दिये जा सकते हैं। हम उन उत्पीड़न के बारे में बात करने जा रहे हैं जो इस अभियान के चलते होंगे। हम उन लोगों के बारे में बात करेंगे जो इस आंदोलन से अधिक प्रभावित होने वाले हैं। हम बात करेंगे भेदभाव की जो यह आंदोलन अपने साथ लेकर आएगा। और बात करते हैं उन सभी चीजों की जिनका बहिष्कार जरूरी है।

भेदभाव भारत मे बहुत लोगो के डीएनए में निहित है जबसे सामाजिक र्निर्माण शुरू हुआ है। लिंग, नस्ल, धर्म, जाति, रंग आदि के आधार पर भेदभाव तो दुनिया भर में हैं। हम सभी ब्लैक लोगों के भेदभाव के खिलाफ अमेरिका में हो रहे “ब्लैक लाइव्स मैटर” विरोध के बारे में सुन रहे हैं। न केवल अमेरिका, नस्लवाद हर जगह है, चाहे वह विकासशील देश है या विकसित ।

हम 21 वीं सदी में हैं, जहां प्रौद्योगिकी, विज्ञान, बुनियादी ढांचा, विकास, इकॉनिमल विकास सब कुछ अपने चरम पर है या उस तरफ़ अग्रसरित है। फिर भी हम किसी आज ख़ुद को भेदभाव तक सीमित रखते हैं और एक ऐसा जीवन जीते हैं जो पाखंड और अन्याय से भरा है।

भारत विविधता में समृद्ध है, हजारों से अधिक विभिन्न जातीय समूह हैं, हमारे पास विविध सांस्कृतिक मूल्य हैं। नॉर्थ ईस्ट के लोगों को हमेशा उनके जातीय संबंध के कारण भेदभाव का शिकार होना पड़ा है (जो हमारे पड़ोसी देश चीन से मिलता जुलता है)।

यह कहना झूठ नहीं है कि नॉर्थ ईस्ट के लोग आजादी के बाद से विभिन्न चीजों से वंचित रहें हैं। वहां से छात्र अध्ययन के उद्देश्य से, नौकरियों और अन्य गतिविधियों के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में आते हैं, जहां उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है।

आप में से कई लोगों ने ऐसे शब्दों के बारे में जरूर सुना होगा, जो लोग उनके लिए इस्तेमाल करते हैं जैसे कि ‘चिंकी’, ‘मोमो वाले, आदि, यह किसी भी भारतीय के लिए बहुत अपमानजनक है कि वह इस तरह से कुछ सुनें और महसूस करें कि वे मुख्यधारा से संबंधित नहीं हैं। जबकि हमें बताया जाता रहा है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति विविधता में एकता है। जब से महामारी शुरू हुई है हमने खबरें सुनी हैं कि लोग नॉर्थ ईस्ट से संबंधी लोगों को ‘कोरोना’ कह रहे हैं।

NHRC के विवरण में कहा गया है कि लगभग 74% लोग जो नॉर्थ ईस्ट से संबंध रखते है उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता हैं जिसमें सबसे ज्यादा 67% लोगों को उनकी नस्लीय समानता के लिए , 4% लोगो को लिंग के आधार पर भेदभाव तथा 3% उनके धर्म के आधार पर भेदभाव का शिकार होना पड़ता हैं।

मैं एक घटना जोड़ रहा हूं, जो मैंने देखी है। जून 2016, मुझे और मेरे कुछ दोस्तों (उनमें से दो नॉर्थ ईस्ट भाग से हैं) इंटर्नशिप कर रहे थे और हमें कुछ तकनीकी सामान खरीदना था, इसलिए हम चंदानी चौक बाज़ार गए, हम थोड़ा जल्दी पहुंच गए थे, बाजार अभी बंद था। हमने फैसला किया कि हम लाल किला घूम लेते हैं। जब हम टिकट खरीद रहे थे तो मैने 30 रुपए दिए और टिकट लिया, जब मेरे साथी ने टिकट के लिए कहा तो विक्रेता ने अधिक पैसे मांगे तो उस ने पूछा ऐसा क्यू तो विक्रेता बोला – आईडी लाओ, आईडी कहा है? (साथी ने उसे अपना आईडी दिखाया) मैंने कहा कि आप आईडी क्यों पूछ रहे हैं तो जवाब दिया कि अरे ये बाहरी लोग ऐसे ही कम पैसे में घूम के चले जाते है। (विदेशी मेहमानों के टिकट की क़ीमत घरेलू लोगों से ज्यादा है)। मैंने थोड़ी देर बहस की पर फिर मेरे एक दोस्त ने मुझे खींच लिया और कहा कि जाने दो। ये सिर्फ़ एक वाकया है, ऐसे कई घटना दिल्ली में आप आए दिन देख सकते हैं।

यद्यपि हमारे संविधान में विभिन्न आर्टिकल हैं जो हर व्यक्ति की अखंडता सुनिश्चित करते हैं जैसे कि आर्टिकल -14, आर्टिकल -15 (जो किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है), आर्टिकल -16, आर्टिकल -17 आदि।

प्रत्येक नागरिक को समान संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं, फिर भी आंकड़े कहते हैं कि भेदभाव कभी समाप्त नहीं होता है। हम एक समाज के रूप में एक ऐसा माहौल बनाने में असफल रहे हैं जो अन्य लोगों को इस तरह के भेदभाव से वंचित, उपेक्षित या किसी भी विषय का अनुभव न कराता हो।

The names most of the fellow Indians uses to call North East Indians.

परिस्थिति की मांग के अनुसार हमें चीनी सामानों का बहिष्कार करना पड़ सकता है लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह हमारे अपने लोगों के लिए विनाशकारी न हो। हमें इस विचार का अभ्यास करने की आवश्यकता है कि प्रत्येक भारतीय उतना ही इस देश का नागरिक है जितना कि हम। उसके अधिकार उतने ही मायने रखते हैं जितने की हमारे। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आने वाले समय में हर कोई भेदभाव वाली भावना का भी बहिष्कार करे। हर एसी सोच का बहिष्कार हो, जो भेदभाव को जन्म देती है।

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