विशेषाधिकार को समझने के लिए पहला कदम यह स्वीकार करना है
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विशेषाधिकार क्या हैं और एक समाज में यह किस तरह के प्रभाव डालता है? प्रिविलेज या विशेषाधिकार का मतलब किसी सुपरपावर से नहीं है। हर वो चीज विशेषाधिकार के अन्दर आती है जो कुछ लोगों के पास तो है लेकिन बहुतों के पास नहीं है। एक बात साफ़ है जो प्रिविलेज्ड हैं वह प्राय: इसे अपना हक़ समझते हैं। जो इसके अभाव में है उनकी संख्या हमेशा अधिक होती है। समाज बहुत से वर्गों में बंटा हुआ है और इस कारण भेदभाव और डिफरेंसेज बनें हुए हैं।

परेशानियां खड़ी तब होती हैं जब प्रिविलेज वर्ग यह देखने और समझने से दूर होने लगता है और यह दिखाने लगे कि हमें दिक्कत नहीं है तो किसी को नहीं। इस कारण उठते हैं अनेक दिक्कतें, और जो कुछ बेसिक ज़रूरतें है अनप्रिविलेज वर्ग को उसके लिए भी परेशानियां होती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कोरोना के चलते लगे लाकडाउन में मजदूरों का पलायन। आइए जानते हैं-

हमारे देश की अर्थ्यवस्था में असंगठित कार्यबल (Unorganized Workforce) का कुल लगभग 80 से 90 फ़ीसदी है और इसका एक बड़ा हिस्सा प्रवासियों का है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाएं और रोजगार की कमी के कारण एक बड़ा हिस्सा शहरों की तरफ़ आता है। यही कारण है कि शहरों में एक बड़ी आबादी मजदूरों की भी है। जो हमें दिखते तो हैं पर हम उन्हें देखते नहीं या यूं कहें कि नज़रअन्दाज करतें हैं।
ये जो अथाह पैसे हम जिम, पार्लर, मॉल और रिहायशी कॉम्प्लेक्स की कीमत के रूप में देते हैं वो क्या सुविधाओं के लिए हैं? उत्पाद के लिए है? नहीं बल्कि उसका अधिकांश पैसा गरीब लोगों को दूर रखने के लिए ही है। आप एक बार को इस पर विचार कर के देखें।

और अब जब हम अंत में उन्हें देखते भी हैं, तो पहला विचार यह आता है कि क्यों?
वे जहां हैं वहां क्यों नहीं रह सकते?
वे आदेशों का पालन क्यों नहीं कर सकते?
वे पटरियों पर क्यों सोते हैं?
वे हमारी सरकार को बुरा क्यों मानते हैं?
सहानुभूति अक्सर अवमानना, निंदा, अवहेलना ​में बदल जाती है। ऐसे ही थोड़ी कहते हैं सहानुभूति एक दैवीय गुण है। और यह रवैया उस भावना को जन्म देता है जो शोषित वर्ग के मानवाधिकारों के हनन तक की वकालत करता है।

गरीब हताश, अशिक्षित, लापरवाह, बेईमान, यहां तक ​​कि बेवकूफ भी हो सकता है लेकिन यह उनके मानव-आधिकारों से उसे वंचित नहीं करता; लेकिन हम उन्हें नजरअंदाज करते हैं क्योंकि नस्लवाद और वर्गवाद दूर नहीं होता है, वे केवल रूप बदलते रहते हैं।

अब जबकि तस्वीरें हर जगह हैं, और हम सब पूरी तरह से वाक़िफ हैं उनके परेशानियों से तो केवल एक ही तर्क बचा है:
हम वह सब कुछ कर रहे हैं जो हम कर सकते हैं, आप भी मदद करें, इसके बारे में बात न करें, सकारात्मक रहें ब्लाह, ब्ला।
देश में ये सब तो चलता रहेगा, आज़ादी के इतने वर्षों बाद आज भी गरीबी रेखा के अंतर्गत लोगों की कमाई 50 रुपए प्रति दिन से कम है
बाकी मानवता और सहानुभूति ज़िंदा रखना है हमें और यह समझना होगा कि अगर हम प्रिविलेज हैं कुछ चीजों को लेकर तो इसका मतलब यह नहीं कि जो इससे वंचित हैं उनका इन पर अधिकार नहीं।

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