विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस : रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य पर विवेचना
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस : रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य पर विवेचना

आत्महत्या की घटनाए आए दिन सुनने को मिलती हैं। आज विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर हम विचार करेंगे कैसे हो रोकथाम और भारतीय समाज मे क्यू जरूरी है मानसिक स्वास्थ्य पर ज़ोर देने की। भारत 1.37 बिलियन की आबादी वाला एक विशाल देश है वहीं चीन की आबादी 1.42 बिलियन हैं। अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के 194 सदस्य देशों में आत्महत्या की दर को मानते हैं, तो भारत और चीन की उसमे 40 प्रतिशत या उससे अधिक की हिस्सेदारी है। विश्व स्तर पर 800,000 वार्षिक आत्महत्या से मौतें होती हैं।

क्या आंकड़े हैं आत्महत्या के भारत में-

हमारे देश में हर साल 1,00,000 से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या के कई कारण हैं जैसे पेशेवर / कैरियर की समस्याएं, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, शराब की लत, वित्तीय नुकसान, पुराने दर्द आदि। NCRB आत्महत्या के मामलों को दर्ज किए आत्महत्या के आंकड़ों के अनुसार। 2019 के दौरान देश में कुल 1,39,123 आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जिसमें 3.4% की वृद्धि हुई है और 2018 की तुलना में 2019 के दौरान आत्महत्या की दर में 0.2% की वृद्धि हुई है।

महाराष्ट्र में आत्महत्याओं की बड़ी संख्या (18,916) दर्ज की गई, इसके बाद तमिलनाडु में (13,493) आत्महत्याएं, पश्चिम बंगाल में (12,665) आत्महत्याएं, मध्य प्रदेश में (12,457) आत्महत्याएं और कर्नाटक में (11,288) आत्महत्याएं कुल आत्महत्याओं की संख्या का क्रमशः 13.6%, 9.7%, 9.1%, 9.0% और 8.1% भाग सम्मिलित करती हैं। इन 5 राज्यों ने मिलकर देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं का 49.5% हिस्सा दर्ज किया है। शेष 50.5% आत्महत्याओं की रिपोर्ट, 24 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में की गई। उत्तर प्रदेश, जो सबसे अधिक आबादी वाला राज्य (देश की आबादी का 16.9% हिस्सा) आत्महत्या से मृत्यु दर का तुलनात्मक रूप से कम प्रतिशत हिस्सा (देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं में से केवल 3.9%) है।

आत्महत्या की संख्या राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के, सोर्स एनसीआरबी

समग्र आत्महत्या करने वालों की पुरुष : महिला अनुपात, वर्ष 2019 के लिए 70.2 : 29.8 था, जो कि वर्ष 2018 (68.5 : 31.5) की तुलना में अधिक है। जिसमे विवाह संबंधी मुद्दों (विशेषकर दहेज संबंधी मुद्दों), और, नपुंसकता / बांझपन में महिला पीड़ितों का अनुपात अधिक था। आयु समूह (18 – 30 वर्ष से क और 30 वर्ष से 45 वर्ष कम आयु के व्यक्ति आत्महत्या करने वाले सबसे ज्यादा थे। इन आयु समूहों में क्रमशः 35.1% और 31.8% आत्महत्याएं हुईं। जिसमे ‘परिवार की समस्याएं’ (2,468), ‘परीक्षा में असफलता’ (1,577), ‘लव अफेयर्स’ (1,297) और ‘बीमारी’ (923) बच्चों (18 वर्ष से कम आयु) के बीच आत्महत्या के मुख्य कारण थे।

आप बाकी के आंकड़े एनसीआरबी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों मे पढ़ सकते हैं- आंकड़े एनसीआरबी पर क्लिक कर के।
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क्यों जरूरी है मानसिक स्वस्थ्य पर ज़ोर देने की-

हमारा समग्र मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि हमारा शारीरिक स्वास्थ्य। जब हम अपने शरीर, पोशाक और कस्टम शर्ट को फिट और स्वस्थ रखने की कोशिश करते हैं, तो हमारे दिमाग को भी फिट और मजबूत रखना आवश्यक है। हालाँकि, हममें से अधिकांश को इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि अपने मानसिक स्वास्थ्य को टिपटॉप आकार में कैसे रखा जाए, और हम उन लोगों को कैसे समझ सकते हैं जो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का सामना कर रहे हैं। क्यों की भारतीय समाज में आज भी मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना तो दूर लोग इस बात को स्वीकार भी नहीं करना चाहते हैं।

पर सच यही की आज दुनिया भर में लगभग आधी युवा पीढ़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही है। उनमें से अधिकांश काम काज के दबाव, पारिवारिक चिंताओं, और खराब आत्मसम्मान के कारण अवसाद और चिंता के विभिन्न रूपों का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा, जो लोग सामना कर रहे हैं वे बहुत सारी खतरनाक गतिविधियों का सामना कर रहे हैं जो गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकते हैं। हालांकि, यह जानकर दुख होता है कि आज भी हमारे समाज में अन्य लोग इस चिंता को नाटक के रूप में खारिज करते हैं या ये कह के टाल दिया जाता है अरे कुछ नहीं हुआ तुझे सब ठीक है। और आत्महत्या के कारणो में मानसिक स्वास्थ्य की अहम भूमिका है।

अगर बात करते हैं कारकों की तो इनमे बहुत से सीजे सम्मिलित है जैसे, भेदभाव ( हर प्रकार का, रंग, जाति धर्म, कार्य क्षेत्र आदि), सामाजिक परिवेश, उत्पीड़न, हरासमेंट, सोशल मीडिया, पारिवारिक माहोल आदि मुख्य हैं। सबसे ज्यादा मानसिक रूप से परेशान लोगों मे आज युवा वर्ग, एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग हैं।

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कैसे करें रोकथाम –

आत्महत्या की रोकथाम के तरीके और उपचार रोगी के रिस्क फ़ैक्टर्स (जोखिम के कारकों) पर आधारित हैं। आत्महत्या के विचारों और कृत्यों को रोकने के अलावा अंडरलाईंग (अंतर्निहित) स्थितियों के मद्देनजर उपचार निर्धारित किए जाते हैं। यदि कोई मानसिक विकार से पीड़ित हैं, तो इस स्थिति का इलाज करने के लिए एक उपचार योजना बनाई जाती है। सबसे आम आत्महत्या रोकथाम तकनीकों में से एक मनोचिकित्सा है – जिसे टॉक थेरेपी के रूप में भी जाना जाता है। यह मुख्यतः संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (Cognitive Behavioral Therapy) या द्वंद्वात्मक व्यवहार थेरेपी (Dialectical Behavior Therapy) के रूप में जाना जाता है।

संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी विभिन्न मानसिक विकारों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए एक सामान्य उपचार विकल्प है। मनोचिकित्सा की इस पद्धति में, तनाव और तनावपूर्ण जीवन के अनुभवों से निपटने के नए तरीके सिखाते हैं। इस तरीके से, जब आत्महत्या के विचार उत्पन्न होते हैं, तो व्यक्ति उन विचारों को पुनर्निर्देशित कर सकते हैं और अपने जीवन को खत्म करने के प्रयास के बजाय एक अलग तरीके से उसका सामना कर सकते हैं।

डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी का उपयोग किसी व्यक्ति को नुकसान पहुचाने (विघटनकारी) या अस्वस्थ भावनाओं या कार्यों को पहचानने में मदद करने के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति मुश्किल या परेशान करने वाली स्थितियों से निपटने के तरीके पर तकनीक पेश करती है। आत्महत्या की रोकथाम से संबंधित मनोचिकित्सा पर अधिक शोध की आवश्यकता है, हालांकि, विशेष रूप से, डीबीटी, को आत्महत्या के प्रयास की व्यापकता को कम करने के लिए सही पाया गया है, लेकिन पूरी तरह प्रभावकारी पद्धति कोई नहीं।

दवाओं को आत्महत्या के लिए एक रोकथाम विधि के रूप में भी निर्धारित किया जा सकता है; हालाँकि, इस पद्धति में बहुत से विवाद मौजूद है, क्योंकि मानसिक विकारों के उपचार में उपयोग की जाने वाली कई दवाओं में साइड इफेक्ट के रूप में आत्महत्या का खतरा बढ़ जाता है। एंटीडिप्रेसेंट विशेष रूप से आत्मघाती विचारों और व्यवहार में संभावित वृद्धि का कारण बन जाती हैं। वहीं रिसर्च की माने तो यह उम्र पर निर्भर हो सकता है। ​​रिसर्च मे देखा गया है कि युवा वयस्कों को एंटीडिप्रेसेंट लेने पर आत्महत्या और आत्मघाती विचारों का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन पुराने व्यक्तियों में, यह दुष्प्रभाव कम हो जाता है।

सामाजिक जागरूकता जो की सबसे मुख्य बिन्दु है, उसपर ज़ोर देने की आव्श्यकता है। आज भी समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर रूढ़ियाँ व्याप्त हैं, जो केवल जागरूकता फैलाने से नहीं बल्कि पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को एक जगह दे कर हल किया जा सकता है। आत्महत्या से जुड़े जोखिम और जोखिम वाले कारकों के प्रति जागरूकता लाने के लिए एक अतिरिक्त प्रयास में, 10 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ साझेदारी में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के रूप में मनाया गया है।

अधिक सुझाव के लिए आप हेल्पलाइन पर क्लिक कर इस दिशा मे काम कर रहे संस्थाओ से मार्गदर्शन ले सकते है। – हेल्पलाइन

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